विश्व पुस्तक दिवस आनलाइन गोष्ठी

विश्व पुस्तक दिवस आनलाइन गोष्ठी


RV NEWS LIVE से संवाददाता सोनू यादव



देवरिया भाटपाररानी नागरी प्रचारिणी सभा, देवरिया और साइंस कम्युनिकेटर्स के व्हाट्सएप ग्रुप पर 'हमारे जीवन मे पुस्तकें क्यों जरूरी है' विषय पर डिजिटल परिचर्चा हुई जिसमें अपने विचार रखते हुए सभा के मंत्री इंद्रकुमार दीक्षित ने कहा कि विज्ञान और तकनीक के विकास के इस युग में मोबाइल इंटरनेट के प्रभाव के कारण नईपीढ़ी के बच्चें पुस्तकों से दूर होते जा रहे है, यह चिंता का विषय है, पुस्तकें बच्चों में जिज्ञासा एवं अध्ययन कि प्रकृति को सहेजने,प्रकृति के रहस्यों को समझने, लोक जीवन संस्कृति कला ज्ञान विज्ञान सभ्यता के बारे में बिना  जब्र दबाव के समय और सुविधानुसार आहिस्ते आहिस्ते ज्ञान की अनोखा दुनिया में ले जाती है इसलिए वे सबसे अच्छी मित्र है दतिया मध्यप्रदेश के पूर्व प्राचार्य सी.पी. पटसरिय ने अपने विचार रखते हुए कहा कि 'पुस्तकों के बिना साहित्य की कल्पना नहीं की जा सकती, ये वे धरोहर हैं, जिसमें सम्पूर्ण विश्व का ज्ञान-खजाना समाहित है, इसलिए ज्ञान की अगाध परम्परा को सहेजने और उसे अगली पीढ़ियों तक पहुँचाने में पुस्तक की भूमिका असन्दिग्ध है, बात को आगे बढ़ाते हुए डॉ. छाया पांडेय ने कहा कि दुनियां के सबसे प्रसिद्ध कवि और नाटककार शेक्सपियर की पुण्य तिथि पर यूनेस्को ने 1995 में और भारत ने 2001 में 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस मनाना प्रारंभ किया। लोगों को क़िताबों की अहमियत समझनी चाहिए क्योंकि ये महज कागज का पुलिंदा नहीं बल्कि अतीत-वर्तमान एवं भविष्य को जोड़ने का जरिया होती हैं,यह पीढ़ियों के बीच एक सेतु की तरह हैं। राज किशोर लाल श्रीवास्तव ने कहा कि हम जब भी किसी वस्तु या विषय के बारे में सीखना चाहते हैं, शिक्षक के बाद हमें पुस्तकों की शरण मे ही जाना पड़ता हैं। प्राचीन काल से जब भी मन के भावों को या खोजे गये अविष्कारों को सुरक्षित रखने की बात आई होगी उसे भाषा और लिपि के माध्यम से पुस्तकों में उतारा गया होगा। पुस्तक दिवस के अवसर पर विश्व के समस्त रीतिरिवाजों, साहित्य तथा ज्ञान विज्ञान को जिन्दा रखने, सुरक्षित रखने के लिए हमें पुस्तकों को संरक्षित करने का संकल्प लेना होगा। प्रियंका सिंह ने कहा कि किताबें हमें ज्ञान और मान दोनों प्रदान करती हैं, परिचर्चा का संचालन विज्ञान संचारक अनिल कुमार त्रिपाठी ने किया उन्होंने कहा कि भले ही ज्ञान प्राप्ति के अनेक डिजिटल माध्यम उपलब्ध हो गये हैं परंतु संस्कृति, साहित्य और कलाएँ पुस्तकों के माध्यम से सुरक्षित होकर अगली पीढ़ियों में जा सकती है। प्रधानाचार्य शैलेंद्र दत्त शुक्ल एवं कृषि वैज्ञानिक डॉ. सन्तोष चतुर्वेदी ने सभी का आभार व्यक्त किया।


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