छतरपुर में क्वारेटाईन सेंटर से निकले बिहारी मजदूर 9 सौ किमी पैदल जाने को मजबूर ,सरकार ने कोटा से AC बसो में बुलाये अमीरों के छात्र,छतरपुर के अधिकारी स्वागत में लगे

छतरपुर में क्वारेटाईन सेंटर से निकले बिहारी मजदूर 9 सौ किमी पैदल जाने को मजबूर ,सरकार ने कोटा से AC बसो में बुलाये अमीरों के छात्र,छतरपुर के अधिकारी स्वागत में लगे
      
 RV न्यूज लाईव ब्यूरो चीफ महेंद्र सिंह ठाकुर छतरपुर



जिला छतरपुर मध्य प्रदेश छतरपुर कोरोना संक्रमण के दौर में पूंजीवाद और समाजवाद का अंतर भी परिलक्षित होते साफ दिखा है। एक ओर वो समपन्न लोग है जिनके बच्चो को राजस्थान के कोचिंग सेटर कोटा से सरकार बसो में लेकर आती है। दूसरी ओर वो गरीब मजदूर है जो पांव में छाले, भूखमरी का शिकार होते हुये सैकडो किलोमीटर पैदल चलते हूये अपने वतन की ओर लोट रहे है। इन गरीबो की ना तो सरकार को फिकर है और ना ही एयरकंडीशन में बैठकर योजनाये बनाने वाले तिलस्मी अफसरो को।



शायद सरकारो ने भी गरीबो के लिये सोच लिया है कि जिसका कोई नही उसका तो खुदा है यारो। इसलिये ही कोरोना के संकटकाल में गरीबो को भगवान भरोसे ही छोड दिया गया है। यह सोच वायरस से भी अधिक खतरनाक है।एक ओर राजस्थान के कोटा में विभिन्न कोचिगो में अध्यनरत बच्चो को लेने के लिये सरकार स्पेशल बस वीआईपी आवोभगत के साथ भेजती है। वहीं दूसरी ओर दिहाडी मजदूर अपने वतन को लोटने के लिये पैर के छालो की परवाह नही कर सैकडो किमी दूर पदयात्रा कर रहे है। छतरपुर जिला मुख्यालय पर 22 अप्रेल की रात्रि दो तस्वीरे नजर आई। एक समपन्न परिवारो के बच्चो से जुडी थी तो दूसरी बिहार के दिहाडी मजदूरो की जो सिर पर पोटरियो का बोझ लाद 900 किमी दूर पैदल मार्च कर रहे थे। कोटा से आने वाले बच्चो के इंतजाम के लिये बस स्टेंड पर चार टेंट लगाये गये जहां मिनरल पानी की व्यवस्था थी। सरकार का लोकनिर्माण, स्वास्थ, पुलिस विभाग सहित अन्य तैनात था। पहले से व्यवस्थाये चाकचौबंद कर ली गई थी कि आने वाले बच्चो को किस अच्छे स्थान पर रूकवाना है। शहर के मैरिज गार्डेन में विन्ध्य क्षेत्र के बच्चो को रूकवाने की चैकस व्यवस्था की गई। जानकारी के अनुसार कोटा से कुल 922 बच्चे छतरपुर लाये गये जिनमें 122 छात्र-छात्राये छतरपुर के थे और 800 विन्ध्य क्षेत्र के रीवा, सतना, सीधी जिले के थे। जिन्हे आज उनके गंतव्य स्थान की ओर बसो से रवाना कर दिया गया। एक नजारा इन बच्चो के आगमन पर प्रशासनिक चाकचौबंद व्यवस्था का था तो दूसरी ओर बिहार के तीस मजदूरो की व्यथा थी जो मानसिक रूप से झकझोर देने वाली थी। छतरपुर जिले के ही रनगंवा बांध पर मछली पकडने का कार्य करने वाले यह मजदूर 6 अप्रेल का पैदल चलते हुये छतरपुर जिला मुख्यालय पंहुचे थे। जिन्हे महोबा रोड पर कन्या छात्रावास के क्वारेटाईन सेटर में भेज दिया गया। 22 अप्रेल की रात 8 बजे इन सभी से यह सेंटर खाली करवा दिया गया। मजदूर जियालाल ने बताया कि पहले उनसे कहा गया था कि उनके बिहार तक जाने की व्यवस्था की जायेगी लेकिन आज यह कहकर निकाल दिया गया कि वो अपना इंतजाम कर ले। इस मजदूर ने बताया कि वे सभी 30 मजदूर बिहार के मोतिहारी जिला के ग्राम चकिया के निवासी है। छतरपुर जिला मुख्यालय से मोतिहारी की दूरी लगभग 900 किमी है। फिर वहां से उनके गांव की दूरी का आंकलन किया जाये तो करीब 950 किमी पैदल सफर पर सिर पर पोटली का बोझ लाद यह मजदूर रात्रि में ही महोबा की ओर रवाना हो गये। हेल्पिग हेंड संस्था के हाकीम चौधरी ने बताया कि उनके द्धारा प्रतिदिन इन मजदूरो को भोजन पैकेट वितरित किये जाते थे। मजदूरो की बेहाली पर श्री चौधरी ने एसडीएम प्रियांशी भंवर से बात की तो अधिकारी का कहना था कि मजदूरो की मांग पर उन्हे छोडा गया है। कई सवाल उठते है कि सरकार के नजरिये के दो पहलू क्यो है। एक ओर कोटा से बसो में लाये गये बच्चे वहीं दूसरी ओर 950 किमी दूर पदयात्रा करते मजदूर। क्या यह वायरस से अधिक खतरनाक नही है जो संपन्नता और गरीबी का बोध कराता है।


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