हसदेव में राजस्थान की खनन परियोजना को SC की हरी झंडी, कहा- विकास के रास्ते में नहीं आएंगे

हसदेव में राजस्थान की खनन परियोजना को SC की हरी झंडी, कहा- विकास के रास्ते में नहीं आएंगे

जिला सिंगरौली मध्यप्रदेश से ब्यूरो चीफ  विवेक पाण्डेय

 

जिला सिंगरौली मध्यप्रदेश रिर्टन विश्वकाशी राष्ट्रीय हिन्दी समाचार पत्र (RV NEWS LIVE) ब्यूरो न्यूज़-सुप्रीम कोर्ट ने राजस्थान सरकार की छत्तीसगढ़ स्थित परसा खदान और हसदेव क्षेत्र के विकास को रोकने की याचिका को खारिज कर दिया है। इस विकासोन्मुख परियोजना के खिलाफ याचिका को रद्द करते हुए शीर्ष न्यायलय ने कहा, वह विकास के रास्ते में नहीं आएगा।

न्यायमूर्ति बीआर गवई और विक्रम नाथ की पीठ ने अंतरिम याचिका को खारिज करते हुए कहा “हम विकास के रास्ते में नहीं आना चाहते हैं और हम इस पर बहुत स्पष्ट हैं। हम कानून के तहत आपके अधिकारों का निर्धारण करेंगे लेकिन विकास की कीमत पर नहीं। हम किसी भी परियोजना को तब तक नहीं रोकेंगे जब तक कि अवैधता बड़ी न हो।" पीठ ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि छत्तीसगढ़ के हसदेव अरण्य वन क्षेत्र में परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण को चुनौती देने वाली कई याचिकाओं के लंबित रहने को, कोयला खनन गतिविधियों के खिलाफ किसी भी तरह के प्रतिबंध के रूप में नहीं माना जाएगा। इसके साथ ही सुरगुजा में राजस्थान राज्य की विज इकाई राजस्थान राज्य विद्युत् उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) द्वारा प्रस्तावित सौ  बिस्तर वाले आधुनिक चिकित्सा सुविधा से युक्त अस्पताल के साथ-साथ आदिवासियों को मुफ्त शिक्षा देने वाली अंग्रेजी माध्यम की स्कूल को भी दसवीं से बारवी तक विस्तारित करने का रास्ता साफ़ हो गया है। 

राजस्थान सरकार का आरआरवीयूएनएल, सुरगुजा जिले के रोजगार और CSR में सबसे ज्यादा योगदान देता है और उसकी नयी खदान खुलने से  स्थानीय लोगों  को और भी लाभ पहुंचेगा। यह खबर छत्तीसगढ़ के लिए भी बड़ी बात है क्योंकि राजस्थान की खदानों के चलते राज्य कोष को लोक कल्याण के लिए  हजारों करोड़ का राजस्व भी प्राप्त होगा। यह उल्लेखनीय है  कि वनीकरण और स्थानीय समुदाय के विकास कार्यक्रमों के चलते राजस्थान का परसा ब्लॉक देश के कोयला क्षेत्र में एक मॉडल खदान की तरह उभरा है।

विश्व का पांचवा सबसे बड़ा कोयले का भण्डार होने के बावजूद, भारत बिजली की किल्लत से पीड़ित है। सौर और पवन ऊर्जा दिन के सिर्फ कुछ ही घंटे बिजली मिल पाने के कारण कोयला आने वाले कई वर्षो तक बिजली के लिए एक प्रमुख स्त्रोत रहेगा। ऐसे में कोयला खदानों को खोलने में विकास विरोधी तत्वों के आंदोलन और फर्जी केस के कारण भारत को स्थानीय रोजगार से खुद का सस्ता निकालने के बदले भारी खर्च से विदेशी कोयला खरीदना पड़ रहा है।  जिसके चलते बिजली के दाम हमेशा महंगे हो रहे हैं । छत्तीसगढ़ और झारखण्ड देश के प्रमुख कोयला उत्पादन करने वाले राज्य हैं । इसके अलावा मध्य प्रदेश,ओडिशा के साथ साथ महाराष्ट्र और बंगाल में भी कोयला पैदा होता है।

राजस्थान की खदान और छत्तीसगढ़

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में स्थित परसा कोल परियोजना राजस्थान राज्य की विज इकाई राजस्थान राज्य विद्युत् उत्पादन निगम लिमिटेड (आरआरवीयूएनएल) को तत्कालीन यूपीए सरकार में आवंटित की गयी दूसरी कोयला खदान है। जब एक तरफ  स्थानीय लोगों ने राजस्थान की इकाई को अपनी जमीन बड़े मुआवावजे के बदले में ख़ुशी से दे दी, उसके बाद आदिवासियों के हित के नाम पर लॉबिंग करने वाले पेशेवर आन्दोलनकारी सुरगुजा की इन सरकारी खदानों को रोकने के लिए अलग अलग हथकंडे अपना रहे हैं। स्थानीय ग्रामीणों की दलील है की छत्तीसगढ़ देश का सबसे बड़े कोयला उत्पादक राज्य है पर कुछ लोग सिर्फ सुरगुजा में ही को खदान या बड़ी इंडस्ट्री लगने दे नहीं रहे है। 

अब जिन ग्रामीणों ने अपनी जमीन अधिग्रहण में दे दी है और मुआवजा प्राप्त कर लिया है, उन्हें परसा कोयला परियोजना में रोजगार की उम्मीद बंधी हुई है। एक तरफ फर्जी कोर्ट केस के कारण उनको राजस्थान की खदान में नौकरी मिलने में  काफी देर हो रही है तो दूसरी तरफ अब वह अपनी जमीन भी जोत नहीं पा रहे। इसके चलते सभी जमीन प्रभावितों ने अपना रोष जाहिर किया है और ग्रामीणों ने खदान के समर्थन व नौकरी की मांग के लिए आंदोलन शुरू कर दिया है। वहीं बेरोजगार युवकों ने जल्द नौकरी न मिलने पर अपने आंदोलन को उग्र करने की  चेतावनी भी दी है।

बिलासपुर कोर्ट में केस हारने के बाद कुछ याचिकाकर्ता ने सर्वोच्च अदालत में अपनी याचिका में 1957 के कोयला असर अधिनियम को लागू करके परसा कोयला ब्लॉक के लिए भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया को चुनौती दी थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता केंद्र के लिए पेश हुए जबकि वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने एमडीओ का प्रतिनिधित्व किया। वकीलों ने मई के छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसले का समर्थन किया, जिसमें कोयला असर अधिनियम, वन अधिकार अधिनियम की प्रयोज्यता और आदिवासी क्षेत्र में सरकार द्वारा भूमि के अधिग्रहण से संबंधित सभी मुद्दों को राज्य के पक्ष में तय किया गया था।

सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय से परसा कोयला परियोजना के किसानों ने राहत की सांस ली है। दरअसल परसा कोल परियोजना के आसपास के प्रभावित ग्रामों के 1700 से ज्यादा ग्रामीणों ने छत्तीसगढ़ के मुखिया भूपेश बघेल और जिले के विधायक और स्वास्थ्य तथा परिवार कल्याण मंत्री टी एस सिंहदेव से लेकर राहुल गांधी तक को प्रार्थना पत्र लिखा है। जिसमें उन्होंने मुख्य रूप से दर्शाया है कि परसा कोल परियोजना के लिए जमीन अधिग्रहण का कार्य पांच वर्ष पूर्व शुरू हुआ था। जिसके अंतर्गत ग्राम साल्हि, जनार्दनपुर, फत्तेपुर, हरिहरपुर, तारा और घाटबर्रा के कुल 722 लोगों ने अपनी जमीन देकर मुआवजा प्राप्त कर लिया है। इसमें से 478 लोगों ने रोजगार के एवज में एकमुश्त मुआवजा ले लिया है जबकि 188 लोगों ने रोजगार का विकल्प चुना था और उनमें से अब तक 10 लोगों को नौकरी मिल चुकी है। शेष 178 लोग नौकरी पाने का इंतजार कर रहे हैं।

ग्रामीणों ने गुहार लगाईं है कि इस स्थिति में एक बार फिर उनके सामने भुखमरी की स्थिति पैदा होने लगी है। इसका कारण यह है कि उनकी जमीन बिकने के बाद भी, अब तक नौकरी नहीं मिल पाई है जिसका मुख्य कारण परसा कोल परियोजना का ऑपरेशन शुरू नहीं हो पाना है। इस वजह से गुजर बसर करने के लिए अब ना तो कृषि के लिए जमीन बची है और न ही नौकरी मिल पा रही है। परिवार के गुजर बसर के लिए मुआवजे की राशि खर्च करनी पड़ रही है, जो ख़त्म होने की कगार पर है।

राजस्थान और छत्तीसगढ़

वहीं पिछले दिनों राजस्थान राज्य विद्युत उत्पादन निगम (RVUNL) के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक राजेश कुमार शर्मा छत्तीसगढ़ के दौरे पर पहुंचे थे और  राज्य प्रशासन को बताया था कि 2007 में केंद्र से मिली खदान के विकास के भरोसे लगाए राजस्थान ने 40,000 करोड़ रुपये बिजली के संयंत्रों में लगा दिए है। हालाँकि विदेशी चंदे से सोशल मीडिया पर और कोर्ट में भारी खर्च से राजस्थान की खदानों के विकास  को रोककर सुरगुजा जिले में नौकरी रोजगार की संभावनाओं को   खत्म करने का षड़यंत्र चल रहा है। सुरगुजा जिले और राजस्थान के लिए राहत की बात है  कि विकास विरोधी तत्वों को अपने लगातार प्रयास प्रयास के बावजूद भी कोर्ट से या स्थानीय लोगो  लोगों से कोई राहत या सहायता नहीं  मिल रहा। पिछले कुछ महीनों में हसदेव का सच जानने के बाद कई प्रमुख व्यक्तियों ने हसदेव को बचाने के नाम पर गोरखधंधा करनेवालों का साथ छोड़ा है। 

इस साल की शुरुआत में राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गेहलोत खुद चलकर छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री और अपनी कांग्रेस पार्टी के नेता भूपेश बघेल से सुरगुजा स्थित खदानों के विकास के लिए   मदद माँगने आये थे। तब विकास विरोधी तत्वों को चेतावनी देते हुए मुख्यमंत्री बघेल ने कहा था  कि जिसको कोयले से विरोध  है वह अपने घर का बिजली कनेक्शन कटवा दे। उसके बाद रायपुर स्थित कथित आंदोलनकारियों को मेधा पाटकर और अन्य  पर्यावरणविदों के पीछे छुपना पड़ा था ।

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