दिव्य गुरु,परमपूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज सनातन धर्म और वेदांत वचनों की विख्यात ज्ञाता के रूप में आज संसार के प्रसिद्ध संतों में गिने जाते हैं

दिव्य गुरु,परमपूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज सनातन धर्म और वेदांत वचनों की विख्यात ज्ञाता के रूप में आज संसार के प्रसिद्ध संतों में गिने जाते हैं 



आदरणीय दिव्य गुरु,परमपूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज सनातन धर्म और वेदांत वचनों की विख्यात ज्ञाता के रूप में आज संसार के प्रसिद्ध संतों में गिने जाते हैं स्वामी सत्यानंद महाराज जी ने सनातन धर्म को जनमानस तक पहुंचाने का संकल्प लिया है 

स्वामी श्री सत्यानंद महाराज जी एक अलौकिक शक्ति के रूप में जाने जाते हैं जिनके जिव्हा पर माँ सरस्वती वाश करती है क्योंकि स्वामी सत्यानंद महाराज जी के द्वारा कहें हुये सभी कथन सदैव सत्य होता है स्वामी जी सदैव सात्विक जीवन जीना पसंद करते हैं धन दौलत सोना चांदी सांसारिक सुख से कोसों दूर रहते हैं अल्पाहारी भोजन ग्रहण करते हैं स्वामी जी जब ईश्वर साधना में बैठते हैं तो कई दिनों तक बिना भोजन पानी के साधना में लीन रहते हैं

 स्वामी सत्यानंद महाराज जी ने संत महिमा का बड़ा ही सुंदर बखान किया है जो इस प्रकार से है - 

जैसे समुद्र से सुधा, शशि और कामधेनु-जैसे सात्विक और विष व वारुणी जैसे असात्विक तत्व प्राप्त हो सकते हैं, वैसे ही जन्मदात्री मां की कोख से संत और असंत पुत्रों का जन्म भी हो सकता है। सात्विक प्रवृत्ति से संपन्न पुत्र को संत कहा जाता है। वहीं असात्विक प्रवृत्ति वाला पुत्र असंत कहलाता है। जब सात्विक गुणों की प्रधानता होती है तो संत और असात्विक गुणों का प्राबल्य उसे असंत बना देता है। मनीषियों ने गुण व स्वभाव के आधार पर संत और असंत की व्याख्याएं प्रस्तुत की हैं। संत तुलसी ने 'बंदउ संत असज्जन चरना' कहकर उनके गुण और स्वभाव के आधार पर उल्लेख करते हुए कहा है-'संत असंतन्हि कै असि करनी। जिमि कुठार चंदन आचरनी।' संत को सात्विक सदाचारी और सर्वहितकारी बताया गया है। वहीं असंत असामाजिक, असात्विक, स्वार्थी व ईष्र्यालु प्रवृत्ति वाला होता है। संत के हृदय में सात्विक चिंतन होने के कारण प्रभु का वास रहता है और असंत का मन सदैव भोग-वासनाओं, काम, क्रोध, ईष्र्या आदि विकारों से ग्रस्त रहता है। संतों का हृदय ही ऐसा होता है कि वे किसी की सेवा नहीं लेते हैं और यदि लेते भी हैं तोत उसका कल्याण करने के लिए लेते हैं। संत की महिमा वेद न जाने। जेता जाने तेता बखाने।। एक संत हजारों असंतों को संत बना सकते हैं लेकिन हजारों संसारी मिलकर भी एक संत नहीं बना सकते। 

 "संत उदय सन्तत सुखकारी । विश्व सुखद जिमि इंदु तमारी।।" प्राणियों की दुखों का हरण कर लेते हैं। - पक्षियों आदि को आनंद प्राप्त होता है।

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